कहीं दूर जब दिन ढल जाए…
Photo curtsey By - Deeptiwari@solotraveller
कहीं दूर, जब दिन ढल जाए और सूरज अपनी सुनहरी किरणों को धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे छुपा ले, तो लगता है जैसे समय भी थोड़ी देर के लिए रुक गया हो। यह वह पल है जब प्रकृति अपने सबसे सुकून भरे रंगों में रंगी होती है – आकाश लाल, नारंगी और गुलाबी के मद्धम मिश्रण से जगमगाता है, और हवा में हल्की ठंडक घुली होती है।
इस क्षण में इंसान अपने भीतर झांकने लगता है। दिन भर की हलचल, चिंता और भागमभाग पीछे छूट जाती है। केवल यह अहसास रह जाता है – कि हम भी प्रकृति की तरह एक लय में बंधे हैं, और हमारी जिंदगी भी सूरज की तरह एक निश्चित समय पर ढलती और चमकती है।
दार्शनिक दृष्टि से, शाम का यह समय हमें जीवन के अनित्यत्व की याद दिलाता है। हर दिन की तरह, हर अनुभव, हर खुशी और हर दुख भी अस्थायी हैं। जैसे सूर्य ढलकर रात को आमंत्रित करता है, वैसे ही हमारे जीवन के हर अनुभव हमें किसी नए अध्याय के लिए तैयार करते हैं।
प्रकृति की चुप्पी में एक अनकहा संदेश होता है – “रुककर देखो, महसूस करो और समझो।” पेड़ों की शाखाएँ धीरे-धीरे लंबाई पकड़ती हैं, पत्तियों पर हल्की ठंडी हवा खेलती है, और दूर पहाड़ या नदी अपने मौन स्वर में हमें जीवन की स्थिरता का एहसास कराते हैं।
शाम केवल दिन का अंत नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और सुकून का क्षण है। यह हमें यह सिखाती है कि समय के साथ सब कुछ बदलता है, और इसी परिवर्तन में जीवन की सुंदरता छिपी है। कभी-कभी, कहीं दूर, जब दिन ढल जाए, हमें बस बैठकर आकाश के रंगों को देखना चाहिए और खुद से पूछना चाहिए – क्या मैंने आज अपने समय को जिया, क्या मैंने अपने जीवन की लहरों को समझा?
और जब अंधेरा धीरे-धीरे घिरता है, तो यह एहसास होता है कि हर अंत में एक नई शुरुआत छिपी होती है। सूरज जहां ढलता है, वहां चाँद और तारे अपनी यात्रा शुरू करते हैं – जैसे जीवन की निरंतरता हमें सिखाती है कि हर क्षण महत्वपूर्ण है, और हर बदलाव में एक नई उम्मीद होती है।
कहीं दूर, जब दिन ढल जाए… यही समय है थमने का, सोचने का, और प्रकृति के साथ खुद को जोड़ने का।



